
नाम की महिमा भाग -22
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*****भाग- 22****
*********नाम की महिमा**********
संत कहते हैं कि इस संसार की रचना त्रिगुणातीत है जैसी जिसकी मूल प्रवृत्ति है वैसी ही रचना करता है तामसी राजसी सात्विकी ये तीन ही आधार है जो संसार की रचना में सहायक है और तीन ही प्रकार के गुणों से संसार में जो भी कुछ फैलाव दिखाई देता है इसी को प्रगुण मई माया कहा गया है लेकिन जिसके अंदर जिस गुण की अधिकता होगी वह उसी की तरफ़ झुक जाएगा और तीनों ही प्रवृत्ति वाले उस प्रभु का भजन करते हैं और अपने गुणों के आधार से ही अपने गुणों की तरफ चले जाते हैं इसलिए तो अनेकों भक्त अपने स्वभाव के आधार से अनेकों प्रकार की भक्तियों की तरफ मुड़ जाते हैं जिनका संबंध ऋद्धियों सिद्धियों की तरफ हो जाता है तू संसार में ख्याति की तरफ मुड़ जाता है और अपने जीवन के उद्देश्य को भूलकर अनेकों प्रकार की चहनाओं को चाहने लग जाते हैं जो एक आत्म कल्याण का आधार न रहकर मांग पूर्ति का आधार बन जाता है जो मन को अच्छा लगता है और जो जीवात्मा मन इंद्रियों के चक्कर में पढ़कर अपने को ही भूल जाती है जिससे मन स्वामी बन गया इसलिए जो कार्य मन को अच्छा लगता है उसी ही हम करते हैं क्योंकि मन काल का एजेंट है इसलिए हमारा मन इंद्रियों से आजाद नहीं हो पाता और नाही सात्विक बुद्धि का विकास होता है हमारा जो भी कर्तव्य होता है वह राजश्री तथा तामसी के आधार का होता है जो हमें हमेशा निचले द्वारा की तरफ ले जाते हैं जो हमारे साथ एक प्रकार का धोखा होता है जैसे हमें महसूस होता है जो कायम करते हैं या कर रहे हैं यह कार्य उसे परमात्मा तक ले जाएंगे लेकिन यह कार्य हमें उस परमात्मा तक नहीं ले जाते।
बाहर मुखी साधनों में लगाई रहते हैं अंदर की हमें खबर नहीं पड़ने देते अगर कोई संत अंदर की बात कहता है तो उसकी बात अच्छी नहीं लगती क्योंकि संतो की मन के विरुद्ध की गई बातें होती हैं इसलिए साधारण पुरुष संतो के तर्क करते हैं और तर्क भी बिना आधार का क्योंकि उनके अंदर इतनी दूरदर्शिता की बुद्धि नहीं होती वह तो एक छोटे दायरे का ज्ञान रखने वाले होते हैं जो हठ पूर्वक उन्हीं बातों को मनवाना चाहते हैं जिनका उनको कुछ ज्ञान होता है इसके अलावा ऐसी पुरुषों के लिए और कुछ है ही नहीं इसलिए परमार्थ वादी संतो से साधारण मजहबी संत महात्माओं की बातें होती हैं जो यथार्थ होती हैं लेकिन धार्मिक अनुयाई महात्मा पंथी इनको भी विन विन दिखाई देते हैं इसलिए साधारण ज्ञान वाले पूर्ण संतो से द्रोह करते हैं मजहब प्रपंच वाले भी संतों पर छींटाकशी करते हैं तू साधारण मनुष्यों की तू बात ही क्या जो महापुरुष की बातों पर विश्वास कर लें। इसलिए समाज में अनेकों प्रकार के क्रियाकलाप होते हुए भी समाज का पतन होता जा रहा है ठीक सूझबूझ नहीं बन पाती ढोंग ढकोसलों में प्राणी मात्र का ध्यान अधिक लगा हुआ है वास्तविकता की तरफ नही है |अधिकांश पुरुष ऐसे होते हैं जो चंद ज्ञान को ही सब कुछ समझते हैं यहाँ एक चिड़िया की बात याद आती है कि चिड़िया ने कहा कि मै अंडे में थी तब में उसी को संसार कहती थी जब अंडे से बहार आई तो घोंसले को संसार मान लिया जब में पेड़ की शाखाओं पर घुमने लगी तो उसे संसार समझ लिया जब मेरे पंख हो गये और आकाश में उड़ने लगी तब समझ आया कि संसार तो बहुत बड़ा है ठीक उसी प्रकार से जो मानव मन इन्द्रियों से उपर उठकर गया हो तो वह जाने कि परमात्मा क्या है और उसको पाने का जरिया क्या है नही तो संसार चिड़िया की तरह ही डाल डाल प्र घूमकर रह जाता है कुछ ही ऐसे पुरुष होते हैं जो आकाश में उड़कर जाते हैं नही तो रिद्धियो सिद्धियों में ही सिमिट कर रह जाते हैं इनके उदाहरण शास्त्रों में भी पाए जाते हैं जिनका मानव दास बनकर रह जाता है मनुष्य उस परमेश्वर को तब याद करता है जब उसका कोई कार्य बिगड़ता है जब उसका कार्य ठीक हो जाता है तब वह उसे भूल जाता है इस प्रकार से संसार में हनीफ खान छाए रखकर व्रत ध्यान करते हैं कोई किसी के लिए कोई किसी के लिए जिससे अनेकों प्रकार की मान्यताएं संसार में फैली हुई है जैसे
1-जब किसी रोग से पीड़ित होता है तब याद करता है|
२-जब किसी कारण से मुझे चाहने लगता है फिर कुछ नहीं|
३-जब कोई कार्य अटक जाता है पूर्ण होने पर कुछ नहीं|
४-जब कोई मुझे पहचान कर मेरे भेद को जान जाता है वही मेरा है सभी उदाहरण सात्विक प्रवृत्ति वालों के हैं| जो किसी प्रकार की कामना नहीं रखता उसे सिर्फ सतगुरु रूपी नाम की लगन लगी रहती है|
******भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)**********



