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नाम की महिमा भाग -06

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*****भाग- 6****

*********नाम की महिमा **********

सृष्टि के रचियता को बार-बार नतमस्तक होता हूँ और विनय करता हूँ तूने मुझ जैसे अधम से भी अधम को अपनी दया मेहर देकर अपने में समाया और जो तेरा वास्तविक नाम है उसका अनुभव करा कर मुझ जैसे निकृष्ट दीन हीन को अपने लायक कर लिया अगर तू मुझे इस मृत्यलोक संसार में फिर से भेज दे तब मै तेरा लाख लाख बार शुक्राना करता हूँ और ये ही कहता हूँ कि किसी भी जन्म में तेरे उपकारों से कभी उऋण न हो हो सकता सो है सर्व व्यापक प्रभु तू अनंत है तेरी महिमा अनंत है तेरे ओर छोर को कोई न जान सका तू अपने में ही परिपूर्ण है जब कोई नही था तब भी तू ही था और जब कोई न रहेगा तब भी तू ही रहेगा तूने जिस किसी को जो कुछ जरा सा जताया वह तेरा हो गया क्योकि जब तक तू जिसके घट में अपना नूर प्रकट नही करेगा तब तक वह तुझे जान ही नही सकता अर्थात जिस किसी को तू अपने भेद को बाताना चाहता है वही उसे जान पाता है तभी तो वह तेरा हो जाता है क्योकि तेरा ही नूर सब संसार की बस्तुओ में निहित है और तेरे ही तेज से चेतन्य है तू ही हर कण में जर्रे-जर्रे में तेरी खुसबू संसार में व्याप्त है तेरे अलाबा कुछ भी नही है | तू जैसा तो तू ही है सो हे देवो के देव ,सर्वव्यापक ,चितानंदमई ,आदि अनंत का करता धरता,अव्यक्त वाणी से परे अनुभव से जानने योग्य है | हे मेरे प्रभु जो भी कुछ लिखूं वह सब तेरी महिमा के लिए काफी नहीं है और न कोई मेरे पास ऐसा कोई शब्द है जिससे मै तेरी बात को स्पष्ट कर सकूँ “सो हे मेरे मालिक तू जिस तरह से मेरी बुद्धि को प्रेरित करता रहेगा और कर(कलम) में विराजमान होकर लेखनी पर अपना अधिकार जानकार जो लिखेगा सो लिख जायेगा” क्योकि मै तो एक काम, क्रोध, लोभ ,मोह का एक थैला हूँ मेरे में तेरी प्रार्थना तेरी स्तुति और विनय करने की शक्ति नही है मै तो तेरा एक अनजान अबोध शिशु हूँ तू चराचर का नायक है फिर भी तेरी जो कोई कृपा का पात्र बन जाता है उस पर तेरी दया धारा कम नहीं होती है| क्योकि तू दयालु है , दोषों को तू नहीं देखता जैसे माँ अपने गंदे बच्चे को बड़े प्यार से पुचकारती है उसकी गंदगी को साफ़ करती है और अपने कंठ से लगा लेती है उसी तरह से हे प्रभु तू है | जैसा तूने मुझे अपनी महिमा का बखान करने के लिए उद्दयत किया है उसी प्रकार आकर मेंरी सहायता करना जिससे तेरा गुणगान लिखा जा सके| सो हे कृपालु में आपकी बार बार विनती करता हूँ मेरे द्वारा किये गए तेरे कार्य में कोई विघन्न न आये यही मेरी तेरे से कामना है | और नहीं तो मेरे द्वारा किया गया कार्य अधूरा होगा और परिहास तेरा होगा तू अंतरघटवासी है |घट-घट की जानने वाला है सो मुझ जैसे दीन हीन की पुकार को सुन और लेखनी में विराजमान होकर अपने कार्य को अपने आप पूरा कर |यही मेरी, मेरा दीनानाथ तेरे से अरदास है | मै तो निमित्त हूँ तू मेरा स्वामी है |

 

 

 

**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************

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