
#नाम_की_महिमा प्रस्तुति #कौशल्य_फाउंडेशन_सोसाइटी
*****भाग- 15****
*********नाम की महिमा**********
जो कुछ इस तरह करें जोई संता संत बिना नहिं पावहिं पन्था।
संतो के बिना परमात्मा को पाने का कोई मार्ग नहीं मिलता क्योंकि हो तू हमेशा नामरूप ही होते हैं और नाम का गुणगान करते हैं संतो और नाम के विषय का आपस में एक ऐसा घनिष्ठ संबंध है जो भी शब्द इनसे जोड़ने में प्रयोग किया जाए वह थोड़ा ही थोड़ा है
संतन आपन नाम जपाया, मूरख जाको भरम न पाया।
चातुर पाया भेद, संत संग नेह लगाया।।
नाम जपाया संत, नाम मे आप छुपाया।
नाम तो नाम ही है इसके अलावा संसार में कुछ भी नहीं है क्योंकि नाम सब का आधार है
सदा सुक्ख दातन ,मोक्ष मूलं सदा ही|
सदा निर्विकारं,तुरीयं सदा ही||
सदा गुणान न तीतमअव्यक्ति ही सदा ही|
सदा बोध गभ्यम ,सर्व व्यापक सदा ही ||
निराकार साकार ,सदा एक रूपा |
अजन्मा अनादी,अनेकों हैं रूपा||
धरा रूप तेरा,तू ही नीर रूपा |
चाँद सूरज सितारे,अनेकों हैं रूपा||
दोहा नाम सभी सरताज हैं ,नाम व्योम पाताल|
सभी श्रष्टि रचना करी,बना काल महाकाल ||
सो हे प्राणी नाम को ही सब कुछ समझकर और नर तन पाने का आधार मानकर उस प्रभु नाम को भज यह संतों का मर्मग्य ज्ञान है
दोहा नर तन पाकर सबही भजो,नाम राम एक सार |
नाम ही परम पुनीत है,भव बंदी छुडावन हार ||
**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************



