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नाम की महिमा भाग -13

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*****भाग- 13****

*********नाम की महिमा**********

दो- कहा कहूँ मै नाम बढाई,राम न सकें नाम गुण गई |

 

तो साधारण पुरुष की क्या ताकत है जो नाम को पहचान सके जो चातुर अपने ग्यानी समझकर मन ,इन्द्रिय,बुद्धि के आधार से नाम का निष्कर्ष निकलते हैं ,वह तो निरर्थक है |इसलिए संत कहते हैं कि-

ज्ञान का पन्थ कृपान की धारा ,गिरत खगेस न लागत वारा

 

नाम के यथार्थ को पाना ज्ञान मार्ग का रास्ता नहीं है यह तो प्रेम मार्ग का रास्ता है और प्रेम भी जब समझ में आता है जब पूर्ण सतगुरु मिल जाता है तब प्रेम कि हम अनेकों प्रकार से व्याख्या करते रहते हैं लेकिन यथार्थ प्रेम ही समझ में नहीं आता अर्थात् परमात्मा के पाने के अनेकों प्रकार के उसूलों का वर्णन किया है लेकिन बिना सतगुरु के प्राप्त हुए सभी क्रियाकलाप ऐसे निरर्थक हैं जैसे अनेकों प्रकार के व्यंजन एक नमक के बिना बेकार है ठीक उसी प्रकार सभी प्रकार की बातें बिना सतगुरु के पाए निरर्थक हैं यहां सज्जन पुरुष भी सोच बैठेंगे कि इस प्रकार की बातें तो नास्तिकों की होती हैं लेकिन वास्तविक यह बातें ही आस्तिकों की है यानी वास्तविकता प्रभु को मानने वालों की है बिना प्रभु को पाए बिना शब्द श्रुति को पाए या अनुभव किए बगैर उस प्रभु के गुणानुवाद का गाना ही नास्तिकता है क्योंकि सब कुछ करने पर भी हमारी मन इंद्रियों के ऊपर कोई असर नहीं होता जो भी कार्य करते हैं मन इंद्रियों के वशीभूत होकर करते हैं और ऊपर से राम राम या अल्लाह अल्लाह या गुरु गुरु करते रहते हैं और मन इंद्रियों के विकारों का ढेर लगा रहता है जो एक नास्तिक के प्रत्यक्ष लक्षण हैं साफ बात यह है कि बिना शब्द सुरति जाने या परा विद्या के जाने बिना प्रभु के लिए कर्तव्य जब तक योग साधन वैराग्य विवेक पूजा पाठ तीर्थ धर्म धन पुण्य सभी निरर्थक मानो क्योंकि इन सब को करने के लिए बावजूद भी मन इंद्रियों की गति में कोई अंतर नहीं पड़ता और साथ ही अहम भाव मान गुमान आशा तृष्णा इर्ष्या डाह जलन बड़प्पन को और जगह मिल जाती है जो किये हुए कर्मों का विनाश कर देती है जो पूरे जीवन के किए हुए सत्कर्म फिर हो जाते हैं अंत में जो शुभकामना का फल मिलना होता है वह भी नहीं मिल पाता और हाथ मलना रह जाता है सो हे चतुर सज्जनों| जीवन में महापुरुष की शरण न जाना या सतगुरु की शरण में जाना ही फलदायक है इसके बाद जो भी कर्म करोगे तब उन्हीं कर्म सभी कर्म फल देने वाले बनेंगे तभी भव सिंधु पार होगा जब सतगुरु मेहर करेगा नहीं तो उसे बिना जाने पहचाने प्रभु के गुणानवाद ऐसे होंगे

 

 

 

 

**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************

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