
#नाम_की_महिमा प्रस्तुति #कौशल्य_फाउंडेशन_सोसाइटी
*****भाग- 12****
*********नाम की महिमा **********
दो- करो निरंतर जासुमन ,सदा नाम गुणगान|
मुक्ति सदा देता रहा ,कहें वेद भगवान||
सभी शास्त्र ग्रन्थों का तथा सभी संत महापुरुषों का वयान यही मिलता है कि नाम की महिमा का कोई बारोपार नहीं है | क्योकि जो कुछ हमें देखने को मिलता है यह सब नाम का ही आधार है जिसे प्रभु की माया कहते हैं संत तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में इसके विषय में एक जिक्र किया है जहाँ तक मन और इन्द्रियों कि समझ बुझ तथा दौड़ है वहां तक माया ही जानो तब बात और स्पष्ट हो जाती है कि जब सब यह माया ही है तो इससे छुटकारा कैसे मिले? संत कहते हैं कि “नाम” से क्योंकि नाम वह लाफ़ानी ताकत है जो सब कुछ करते हुए भी समाई हुई है लेकिन फिर उसका अस्तित्व अलग है जैसे मानव शरीर में सब कुछ उसी के आधार का सहारा है फिर भी अलग है क्योंकि मानव शरीर की रचना हुई वह उसी वह उसी के हुकुम से हुई और यह कार्य देवताओं ने किया यहां एक बात और आती है कि जो मानव शरीर है इसमें देवता तथा राक्षसों का बास है जो शास्त्रों के मुताबिक 33 कोटि देवता और 33 कोटि राक्षस यानी 66 कोटि देवी देवता तथा राक्षसों का बास करने का मुकाम यह मानव शरीर ही है बुद्धि विचार के आधार से जिसकी बुद्धि इतनी सबल होगी जोकि इन 66 कोटि की दी हुई सीख को अपनी बुद्धि के आधार पर इनकी बातों का एक ठोस आधार ढूंढ निकाले यह जीव के लिए असंभव ही नहीं बल्कि अति कठिन है क्योंकि नाम की महिमा का यथार्थ बोध पाने के लिए जो सभी शास्त्रों का ज्ञाता हो अति ज्ञान रखने वाला हो अमिट बोध रखने वाला क्यों न हो फिर भी यथार्थ तत्व सार प्राप्त नहीं कर सकता है इसलिए तो बिना सतगुरु के यथार्थ ज्ञान यथार्थ बोध यथार्थ नाम से परिचय नहीं हो सकता क्योंकि सत्गुर ही वह सत्य है जो नाम से जुड़ा हुआ है यानी नाम रूप है इसलिए नाम के भेद को नाम ही जता सकता है यहां इस बात को ठीक से समझ लेना चाहिए कि बिना सतगुरु के “नाम” जिसे राम भी कहते हैं इसकी महिमा को जाना नहीं जा सकता इसलिए सतगुरु का पाना ही जीवन का कल्याण है सतगुरु का मिलना भी जब ही होता है जब हमारे अनेकों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और शुभकामनाओं का शुभारंभ होता है तब हमारे दिल में उस प्रभु से मिलने की तड़प पैदा होती है और उधर उस प्रभु की हमारी जीवात्मा के ऊपर प्रेम की वर्षा होती है तब हमें सतगुरु मिलता है और हमें विश्वास होता है इतने पर भी सब कुछ होते हुए भी विश्वास न होना इसका मतलब है कि एक तो हमारे पापों का पूर्ण नाश न होना दूसरे उस प्रभु की अनुकंपा न होना इसके लिए हमें स्वयं पश्चाताप करना होगा तड़प पैदा करनी होगी अपनी भूलों को ढूंढना होगा जब यह बातें सभी ठीक हो जाएंगे तभी सतगुरु पर विश्वास हो जाएगा और जब विश्वास हो जाएगा तब नाम की महिमा का हमारे चित्त में असर पैदा होगा इससे पहले नहीं इससे पहले तो हम उन्हीं अक्षरी नामों को वास्तविक समझकर रट लगाते रहेंगे लेकिन वास्तविक पर्दा नहीं खुलेगा यही अज्ञानता से ढका हुआ पर्दा है तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में जिक्र किया है कि नाम की महिमा का बयान कैसे करूं जो राम त्रिलोकी के स्वामी थे अवतार थे उनके विषय में भी तुलसीदास जी ने अपनी जुबान पेश करते हुए यही कहा है
**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************



