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नाम की महिमा भाग -09

#नाम_की_महिमा प्रस्तुति #कौशल्य_फाउंडेशन_सोसाइटी

*****भाग- 09****

*********नाम की महिमा **********

दोहा संत करहि उपकार ,जीव चिताएं सब तरहि|

करहि अविद्या नाश ,सोक ,मोह ,सब तन हरहि||

मन माया से घिर रहा ,आत्म तत्व का वोध |

ज्ञान सतगुरु करें निहाल जब ,तब आपन पहिचान ||

जब मनुष्य अपना आपा जान लेता है तब वह दूसरों के गुण अवगुणों पर नजर नहीं रखता है क्योकि वह यह जान जाता है कि मानव को अपने ध्यान नहीं हैं इसलिए वह दुसरे के गुणों को भी अवगुणों की संज्ञा देता है क्यों कि अपने अवगुण उसे गुण दिखाई देते हैं और दुसरे गुण अवगुण जैसे इन बाहरी आँखों से बाहरी सभी बस्तुएं दिखाई देती हैं लेकिन अपना मुह दिखाई नहीं देता अपने मुह देखने को बाहरी साधन यानी शीशा प्रयोग करना पड़ता है वैसे ही ठीक दुसरे के गुण हों या अवगुण हों वह दिखाई देते हैं और अपने अवगुणों को गुण कहता है इसलिए तो व्यक्ति दूसरों की बुराई करने का माहिर बनता चला जा रहा है पर उसे अपने का ख्याल नहीं है | अपने का ख्याल तो उसे तब होगा जब किसी की महापुरुष के बताये हुए मार्ग का अनुशरण करे और जो नाम प्राप्त हो उसकी कमाई करे तब वह इस तथ्य को समझेगा और निजा रूप के दर्शन करेगा तब भ्रम रूपी खाई समाप्त होगी नहीं तो संसय रूपी जहाज में बैठकर भ्रमण करेगा स्थिरता नहीं आएगी | बिना स्थिरता के मन निर्मलता नहीं जब तक मन निर्मल नहीं होता तब तक संतों की बातों पर विश्वास नही होता इसलिए तो संत रूपी अमृत को त्याग कर असंत रूपी बिषपान करता है जिससे बुद्धि में सच्चा विकास नहीं होता और तर्क मई बुद्धि बन जाती है जबकि साफ़ बात है कि परमात्मा नाम है बर्ड है ज्योति है आकाशवाणी है गगनगिरा है कलमा है नुरे इलाही है अनेकों उसके नाम हैं लेकिन इन सबकी झलक इन्द्रियों से तथा मन बुद्धि से परे पारब्रह्म में दिखाई देगी और आवाज भी सुनाई देगी यहं से आत्मा परमात्मा का रास्ता चालू है |यानि जीते जी मरने की विद्या है गीता के अनुसार निबृति मार्ग है संतों के आधार से परा बिद्या जो सूर्य मंडल का रास्ता है |जप ताप योग साधन कर्म पूजा पाठ पढ़ना तीर्थ ये सभी प्रवृति मार्ग में आते हैं जिसमे बुद्धि विचार से निष्कर्ष निकलना है इसमें देहाभिमान हमेशा बना रहता है काम क्रोध लोभ मोह डाह ईर्ष्या राग द्वेष द्वंद आदि से कभी छुटकारा नहीं होता और इस मार्ग का चलन सिर्फ देवादि लोकों तक ही है रिद्धियाँ सिद्धियाँ सभी इसी में आती हैं आत्मा की मुक्ति इस मार्ग में नहीं हैं इसे चाँद मार्ग का रास्ता कहते हैं जिसे अपराविद्या भी कहते हैं |आत्मा की मुक्ति लिए तो ये तो परा विद्या का रास्ता अवश्य ही अपनाना पड़ेगा इसके अलावा किसी यत्न से आत्मा की परमात्मा से मुलाकात नहीं हो सकती ये पढने लिखने बुद्धि विचार से निष्कर्ष निकलने का रास्ता नहीं हैं |यह तो अनुभव का रास्ता है इसलिए तो बिना पुरे सत्पुरुष के इस रस्ते को पाना तथा उसका समझ में आना कठिन हैं तभी तो संत कहते हैं कि

“”पूरा भेंटिये,पूरी होवे जुगति””

बिना सतगुरु के भेंटे ज्ञान मान बडप्पन का अहम समाप्त नहीं होता और जब तक ये बिकार शारीरिक चेष्टाओ में पनपेंगे तब तक बुद्धि शुद्धि नहीं होगी |

परमात्मा को पाने के लिए सभी प्रकार के विकारों से मन इन्द्रियां मुक्त होनी चाहिए और शारीरिक सम्बन्ध ऐसा होना चाहिए जब चाहे तब सूक्ष्म अतिसूक्ष्म आत्मिक आधार से शरीर से बाहर तब वह शारीर परमात्मा के “”नाम”” के लायक हो पाता है और जो ऐसे ही तन हैं वे ही उस परमात्मा के नाम के वसने लायक होते हैं

वैसे तो परमात्मा सभी तनों में बिराजमान हैं यहं पर भीका साहब ने अपने वयान में बताया है|

भीका भूखा कोई नहीं ,सब घट गठरी लाल|

गृह खोल के देख ले ,काहे बना कंगाल||

सब घट मेरे साइयां,सुनी सेज न कोय|

बलिहारी जिन घट न को ,जिन घट परघट होय||

जिस तन में वह इजहार होता है वही तन परमात्मा का तन होता है और वही तन शुद्ध साफ़ चेतन्य हो जाता है साथ ही वही तन सभी बिकारों से मुक्त है

**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************

 

 

 

 

 

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