
नाम_की_महिमा भाग -3
#नाम_की_महिमा भाग -3#
हे दीनबंधु दया निधि करुणा निधि तू कृपाल हो।
कैसे करूं तेरी स्तुति तू ज्योतियों में ज्योति हो।।
मन बुद्धि से ना तुझे पा सके नहीं पा सका कोई ज्ञान से। शरणागते जो जो हुआ पाया उसे तू ध्यान से।।
कामादि से तू दूर है लोभादि से तू दूर है।
मन मान और अहंकार से भी हे प्रभु तू दूर है।।
सब त्याग कर संसार रस रस ना भजै तेरे नाम को।
हो शरण तेरी दिन बन पाता नहीं तेरे धाम को।।
फिर भी इशारा है तेरा देगा वही जो पाएगा।
जो घट बनाया घर तूने वह घर तेरा बन जाएगा।।
ली ने उठा तूने अधम से उन अधम में एक हूं।
सारा पसारा है तेरा कित कित लखूँ कहां कहां लखूं।।
नहीं गा सका गुणगान तेरा ज्ञानियों में अज्ञान हूं।
पर हूं शरण तेरी प्रभु उन दर्शकों का दास हूं।।
ऐसी दीनदयाल हो दीनन केहूं तुम नाथ।
जन्म-जन्म प्रभु जी मेरा छोड़ ना देना साथ।।
**************भरत सिंह*******************



