
नाम की महिमा भाग -23
#नाम_की_महिमा प्रस्तुति #कौशल्य_फाउंडेशन_सोसाइटी
*****भाग- 23****
*********नाम की महिमा**********
गाना चुनरिया मेरी ऐसी रंगाय दे सतगुरु पीर
रंगी चुनरिया दादूँ पलटू नानक संत फकीर
चुनरी भीगी रंग अनेकों पढ़ी नहीं भदरंग
चुनरिया………………………………………………..
हरी गुलाबी नीली पीली मटीयल धोरी और बसंती रंग
जस जस चुनरी क्षीण होती जाए यह सभी रंग होय न भदरंग
चुनरिया…………………………………………..
एक दो तीन चार पांच छह सात आठ
आठऊ याम उढ़ाय दे मोकू रहे न कोई अंग
ओढ़ी सभी संत भक्तन ने ओढ़ी दास कबीर
चुनरिया……………………………………………………….
रँगन में एक रंग अनोखा बदलत रंग कबहुं नही देखा
चाहे चादर है जावे क्षीण रंग ही काला जो मतवाला वो रंग तक सीर
चुनरिया……………………………………………….
काले नयन केशऊ काले चुनरी काले रंग की
कबहुं न उड़े पड़े नहिं फीको नहि होय कभी भदरंग
ऐसी रंग रंगाय मेरी चूनर दर्शन सतगुरु पीर
चुनरिया
जब कोई व्यक्ति जिस किसी महापुरुष का आशिक बन जाता है वह अपने मुर्शिद से अपने को उसमें समूह ने के लिए तटस्थ रहना चाहता है इसलिए वह अपने प्रीतम को अपने हृदय में बसाने के लिए अनेकों प्रकार के शब्दों को अपनी भाषा में प्रयोग करता है फिर भी किसी शब्द से जो उस मुर्शिद के लिए प्रयोग करता है दिल की कशिश समाप्त नहीं होती बल्कि और बढ़ जाती है जो अपने मुर्शिद के लिए जितना तड़पता है उसकी और परमात्मा की दूरी उतनी ही कम हो जाती जाती है इसलिए ही तो जो सच्चे प्रभु का सच्चा सुख होता है वह कभी भी अपने प्रभु प्रीतम का सेवक भी अपनी जिव्या से नहीं कहता कि मैं सेवक हूं वह मुंह को जाता है क्योंकि सेवक अपने को कह लाए तो सेवा का धर्म तो बहुत कठोर है तो बताओ सत्य परमात्मा के आशिक को अपने को सेवक कहलाने का अधिकार क्या है|
******भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)**********



