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नाम की महिमा भाग -11

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*****भाग- 11****

*********नाम की महिमा **********

दो0 सभी देव मिलकर कारज करो,दिया प्रभु सन्देश|

नर तन की रचना करो, अरु आप करो परवेश||

सुना देव सन्देश प्रभु ,होय ख़ुशी अपार|

रचना नर तन की में लगे,अपने अपने वार||

किसी ने हड्डी किसी ने मासा किसी ने रक्त बहाया है|

जिस जिस अंग को रचा जिस ने ,अपना वास बनाया है||

स्वामी आप बने स्वयं ही ,इन्द्रिय द्वार बनाये हैं|

ब्रह्मा रहा बुद्धि का मालिक ,कटि में काम बसाया है||

गुदा प्रदेश में वास गणेशा,हृदय बिष्णु वास बनाया है|

कंठचक्र में योग शक्तियां दुर्गा वास बनाया है||

रचे अंग सब सभी देव मिल ,निज आप ही वास बना डाले

जगह तनिक न रही बदन बिच,भूल गए सब हो मतवाले||

 

दोo पूरा कारज हुआ जब ,पूरा हुआ शरीर|

कहें देव उठ जाग अब,क्यों पड़ा हुआ वेपीर||

पड़ा रहा बोला नहीं ,करें सोच सब देव|

कमी कोई भी ना रही ,ना बदलफेर हुई देव||

कोई अंतर ना रखा ,सब देव रहे बिलखाय|

ब्रह्मा आई याद जब ,सबको रहे समझाय||

चलो प्रभु के पास अब ,कारण पूछो जाय|

हुक्म आप पुरन किया,पर बोला उठा न जाय||

सभी देव स्तुत करी,आ प्रगटे प्रभु आप|

धीरज सब देवन दिया ,कहो कौन संताप||

ब्रह्मा बोले विनय कर,सुनहु जगत प्रतिपाल|

पाय हुकम नर तन रचा ,पर बोला नहीं तत्काल||

अपने अपने वास हम,सबने लिए बनाय|

तनिक जगह खली नहीं,अब समझ कछु ना आय||

ब्रह्मा की सुन बात कू ,प्रभु रहे मुस्काय|

अपर भाग खाली कोई,तुरत देयो बतलाय||

मेरे ऊपर भाग जो ,खाली सभी दयाल|

करो जोय जो उचित है ,पर चेताओ तत्काल||

बचन सभी से ले लिए ,क्या नतमस्तक होंगे आप|

सभी देव हाँ कह दिया ,पारब्रह्म आय बिराजे आप||

मिला सहारा प्रभु का ,नर तन हुआ निहाल|

देव कहा जागो उठो,बोल उठा तत्काल||

सभी देव विनती करी ,स्तुत करी महान|

ताते नर तन श्रेष्ठ है, तुम जानो सज्जन गुणवान||

पारब्रह्म प्रभु बसत है ,वही उसी का धाम|

पारब्रह्म पहुचो तभी ,जबहि मिलेगा नाम||

सभी संत यों कहत हैं ,सुनो लगाकर ध्यान|

काम क्रोध बिच ना मिले ,नही मिले अरु मान||

 

इसलिए संत कहते हैं कि

जिस देहि को सुमिरें देव ,ये देहि हरि की सेव|

करें इन्द्रियां हलचल सारी,वो शांत कभी ना होती हैं||

मन बुद्धि के साथ वो मिलकर ,खेल अनोखे रचती हैं|

सच्चा भासें खेल जगत का,परि ये तो सभी मिथ्या है||

सभी देव मिल खेल रचाया ,पर एक अविनाशी ही सच्चा है|

 

सो मानव अहंकार का त्याग कर प्रभु का भजन कर

 

 

 

**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************

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