देशधार्मिक

नाम की महिमा भाग -10

#नाम_की_महिमा प्रस्तुति #कौशल्य_फाउंडेशन_सोसाइटी

 

*****भाग- 10****

*********नाम की महिमा **********

चौ० सोई तन सुंदर सुखद सरीरा ,वसहि जासु तन नाम गंभीरा

यही तन दुर्लभ अति संसारा ,आगम निगम पुराण सभी उच्चार

9

रहहि ज्ञान जब तकहि सरीरा ,काम क्रोध मद वसहि शरीरा

दुसर दोष कबहूँ नहि चित लाबऊ,घृणा दोष सब राग बिसारऊ

करहूँ सदा संतन कर संगा ,जाते होय मान मद भंगा

 

आस त्रास कबहूँ नहि मन लाबऊ,पर निंदा नहि चित्त बसाबऊ

 

दो०- बसहि जासु मन अनहित सदा ,पर निंदा अपकार |

वे नर अधम नीच अति ,करहि कपट व्यवहार ||

जिनके मन कुंठित सदा,राग द्वेष सौं प्रीत |

निर्मल मन नहीं हो सके,नहीं होय नाम संग प्रीत||

 

चो०- ज्ञान मान मन कबहूँ न करई,पर हित काज सदा हीय बसई

ज्ञान विवेक मोक्ष कर दाता ,भजहि जो नाम वही फल पाता

काम क्रोध ढिंग कबहूँ न आवत ,मत्सर डाह सब सोक नसावत

नाम जपहि वो चतुर सुजाना ,जीवन मरण सदा सुख जाना

जिनके हृदय विराग न होई,अहम भाव बिच रति पति होई

सो जानहि नहि नाम पियूषा,बसहि जासु मन कर्म विदूषा

 

सो०- जो न जपहि प्रभु नाम ,सहहि दुक्ख दारुण सदा

होय न मन अभिराम कपटी लोभी लोलुप सदा

 

चो०- जपत नाम सब मोह नसावन,जाघट बसहि वही तन पावन

दुरमति कुमति ढिंग कबहूँ न आवति ,सदा आनंद परम सुख पावति

नामही एक तत्व जग माहि ,पावन जाय हेत जोग जप करहि

मन चंचल अति कठिन कराला ,तबही रुकही जपहि पीये नाम रस प्याला

संतन की ये उपवास अनेक किये हैं जोग जप औरु विवेका

बिन सतगुरु नाम नहीं मिलही ,मख वृत्त दान अनेकों करही

 

दो०- तीर्थ पुन्य लाखों करो,चाहे कर्म धर्म सब काम

बिना मिले भेंटे सतगुरु के नहीं मिलेंगे राम

 

छ०- चरण गुरु के हैं जो पावन छूअत मोह नसावहि

तिर्थादी जप ताप योग का फल वो सब तुरत ही पावहि

प्रेम नित नित होय मन में ,अरु नाम निशदिन ध्याबहि

तम पुंज का हो नाश तब सद्गुण ,सुबुद्धि आवहि

 

सो०- मिटहि हैं चित्त विकार राग द्वेष सब तब तम मिटहि

होय अविज्ञा नाश भरतऊ,गुरु रज मस्तक धरहि

 

चो०- नाम अनंत अनत गुन खानी , जाय पाय जीव होय ब्रिहम ग्यानी

सुंदर सुखसद वाही गरु आई ,नर तन पाय धन नाम कमाई

वो ही चातुर वो ही अति गुनवंता,नामही जपहि जपहि जाय संता

आदिऊ अंत जबहि यही जाना , बोध यथारथ होय जाय वेद पुराना

नामही एक जगत प्रति पालक ,धरा पातळ व्योम संचालक

नामही ज्योति अखंड अनूपा,सूरज चाँद धरे हैं सब रूपा

चौदहूँ भुवन नाम आधारा,पारब्रह्म जाय संत पुकारा

 

दो०- अंड पिंड ब्रह्मांड में नाम जाग है नाहि

मन इन्द्रिय शक्ति मिले ,पावने आत्म बोध है न्याहि

रमन करे हर रोम में ,नाम शबद धुनि नाहि

ये सब प्रापत होइंगी,पारब्रह्म में जाहि

 

मनुष्य तन से पहले देवी देवता तथा फरिस्ते थे मनुष्य तन की उत्पत्ति बाद में देवी देवताओ के द्वारा हुई क्योकि प्रभु ने यह सोचा कि इनके द्वारा पूरी श्रृष्टि का सञ्चालन नहीं हो पायेगा तब प्रभु ने देवी देवताओ को मनुष्य तन रचने का सन्देश दिया तब सबने मिलकर मनुष्य तन की रचना की |

 

**************भरत सिंह (अध्यात्मिक विद)*******************

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *